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आज सम्पूर्ण दक्षिण एशिया एक अन्धकारमय भविष्य की नियति से जूझ रहा है , सिर्फ वक़्त ही इस बात का ज़वाब दे सकता है कि एक ही संस्कृति को व्यापक तौर पर साझा करने वाले लोग आखिर कब ब्रिटिश राज के घावों को भुलाकर एक सह - अस्तित्व को स्वीकार कर सकेंगे  ?


इस बात का ज़वाब कहीं ना कहीं हमारे इतिहास में ही छुपा है | हजारों साल से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत को इस उप - महाद्वीपीय भू - भाग ने तमाम तरह के अतिक्रमणों और इसे नष्ट कर देने के कुत्सित इरादों के बावजूद ना सिर्फ बचा के रखा बल्कि पूरे क्षेत्र में ही एक साझी सोच और बहुलवाद की भावना को भी विकसित किया जिसके उत्तराधिकार को हिन्दू , मुसलमान , सिख , बौद्ध , ईसाई और हजारों जनजातीय व्यवस्थाएं जी रही थीं | आज भी इस क्षेत्र में व्यवस्था तो वैसी ही है लेकिन यह समस्त भू - भाग अब पांच स्वयम्भू देशों में बँट चुका है और साम्राज्यवादी शोषण की एक जीती जागती मिसाल हमारे सामने रखता है |


अंग्रेजों के आने से पहले भी यह सरजमीं बेहद रक्तरंजित रही है लेकिन यहाँ आने वाले और बसने वालों ने कभी भी हिंसा को एक उपनिवेशवादी शक्ल नहीं दी | भले ही हमलावर खुद को खालिस तुर्की , चंगेजी , फारसी खून मानते रहे हों , यहाँ की मिट्टी ने उनको भी अपना मुरीद बना ही लिया | अत्याचारों के लम्बे सिलसिले के बावजूद हम एक सहिष्णु समाज बनाने की तरफ बढ़ रहे थे | यह समाज एक आर्थिक एवं सामाजिक सौहार्द और परस्पर निर्भरता का ताना - बाना बुन रहा था जिसमें मजहब भले ही भिन्न हो लेकिन हित तो समान ही थे , एक ही मुल्क और इससे जुडी विरासतें हम सभी को आगे ले जानी थीं |  अंग्रेजों ने आकर सबसे पहले हमारे इसी स्वरुप को नष्ट करने का प्रयास किया | हिंदुस्तान की सारी मौलिक उपलब्धियों को उन्होंने अपने शोषण से रौंद डाला | गोरी कौमों ने अनगिनत अत्याचार किये क्योंकि हिंदुस्तान की सरजमीं उनके लिए सिर्फ एक ,

' भौतिक सम्पदा '  मात्र थी जिसका ना ही कोई आध्यात्मिक मूल्य था और ना ही वो उनके पूर्वजों की विरासत थी | वरतानियों की इसी भावना ने शोषण का एक अंतहीन सिलसिला शुरू किया जो आज तक जारी है | शोषण की इस अमानवीय त्रासदी को पूरे भारत ने भोगा है | कोई भी हो चाहे वो हिन्दू हो या मुसलमान , बौद्ध हो सिख या प्राचीन ईसाई समुदाय सभी के मूल आर्थिक , सामाजिक या फिर आध्यात्मिक स्वरुप को नष्ट करने की कोशिश की गयी | अंत में बेहद रक्तरंजित परिवेश में आज़ादी तो हासिल हो गयी लेकिन गोरी कौम अपनी साजिश में सफल हो गयी और उन्होंने मुल्क को कई टुकडों में बाँट दिया | इस नापाक मनसूबे के पीछे कहीं ना कहीं रंगभेद और नस्लीय श्रेष्ठता का भाव भी काम कर रहा था |


आज भी विभाजन की उसी त्रासदी को पूरा उपमहाद्वीप झेल रहा है | जो मुल्क इकठ्ठे रहकर जगत में सिरमौर बन सकते थे उनकी सारी उर्जा आपसी रंजिश में ही समाप्त हो रही है | आज भी इनकी आपसी रिश्तों पर पड़ी गांठे कहीं ना कहीं गोरी साजिशों की ही देन है , जो कि इस भू - भाग की क्षमताओं और विश्व शक्ति बन सकने की संभावनाओं से वाकिफ है |


मुझे लगता है इतिहास के अत्याचारों और वर्तमान की साजिशों के लिए गोरी कौमों को हमसे माफ़ी माँगनी चाहिए | लेकिन उससे भी पहले हमें आपसी भेदभाव भुलाकर एक शांतिपूर्ण सह अस्तित्व को हासिल करना होगा साथ ही प्रत्येक प्रकार से गुलामी के प्रतीक चिन्हों को मिटाकर सांकेतिक गुलामी को भी अस्वीकार करना है |


आज के हालात में इस बात पर संदेह है कि अंग्रेज कभी हमसे माफ़ी मांगेगें , आखिर जो कौम अपनी हरकतों के लिए शर्मिंदा भी नहीं हो उसकी नीयत पर हम कभी यकीन कैसे कर सकते हैं ? लेकिन अब वक़्त आ गया है जब हम एक ताकत के रूप में सामने आयें और उनको माफ़ी के लिए मजबूर करें | इस बात से इस सरजमीं पर अनगिनत अत्याचारों को झेल चुकी जनता को एक नैतिक मनोबल तो मिलेगा ही साथ ही यह हमारे पूर्वजों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी |




|| " सत्यमेव जयते " ||






कहते हैं कि बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी |
आज जब संचार क्रांति के इस युग में किसी भी बात का बतंगड़ बनाने में सौदागरों ( मीडिया के ) को 5 मिनट भी नहीं लगते ऐसे में कोई भी बात रखने से पहले राष्ट्रीय सरोकार  को ध्यान में ना रखने वाले कहीं भी ना सिर्फ मुहँ फाड़कर चले आते है बल्कि देश की इज्ज़त को तार - तार करने से भी नहीं चूकते , ऐसे में क्या ये प्रश्न नहीं खड़ा होता कि आखिर कथित रूप से बोलने की आज़ादी के आखिर मानक क्या हैं ?

अब उदाहरण के तौर पर हाल ही में वरिष्ठ परमाणु वैज्ञानिक डॉ के . संथानम ( गौरतलब है कि डॉ के. संथानम पोखरण - 2 में परीक्षण स्थल के निर्देशक रह चुके हैं ) द्वारा जब पोखरण - 2 की सफलता पर सवाल उठाये गए तो एक बार फिर से ये सवाल जनता के जेहन में कुलबुलाने लगा कि बोलना तो ठीक हो सकता है पर देश की कमजोरियों पर बोलने के लिए क्या बिकाऊ और गैर - सरोकारी मीडिया ही अंतिम विकल्प है ?

यहाँ प्रश्न डॉ के . संथानम की नीयत पर नहीं बल्कि उस पूरे परिदृश्य पर है जिसमें एक आम आदमी का विश्वास विचार-  विमर्श से उठ गया है | क्या डॉ के . संथानम इस बात से नावाकिफ थे कि इस प्रकार की कोई भी अभिव्यक्ति हमारे देश की सुरक्षा व्यवस्था पर सारे संसार के सामने एक सवालिया निशान लगा देगी  ? अगर देखा जाये तो नहीं , और भी कुछ विकल्प अवश्य उपलब्ध थे जैसे कि इस पूरे मामले में अगर सत्तापक्ष आपकी बात नहीं सुन रहा तो विपक्ष को पूरे भरोसे में लेकर गोपनीय रूप से सरकार पर आगे की कार्यवाही का दबाव बनाया जा सकता था अगर बात फिर भी नहीं बनती तो कारगर जनांदोलन का स्वरुप तैयार करने की पहल की जा सकती थी | लेकिन अब इस पूरे मामले में बात ना सिर्फ बिगड़ गयी है बल्कि सम्पूर्ण सुरक्षा तंत्र ही जनता का विश्वास खोने लगा है |



मीडिया में इन खबरों को चटकारे लेकर लल्लू - पंजू जानकारों ने भी अपनी राय ऐसे रखी है कि आम आदमी देश की सुरक्षा नीति पर ही सवाल उठाने लगा है | ठीक ऐसी ही शर्मनाक भूल भूतपूर्व थल सेना प्रमुख सेवानिवृत जनरल वेद प्रकाश मलिक भी यह कह के कर चुके हैं कि परमाणु क्षमता के बारे में सेना को विश्वास में नहीं लिया गया है , ' चीन की बराबरी करने का सामर्थ्य भारत में नहीं है ' बोलने वाले एडमिरल और 'अमेरिकी भेदिये' के बारे में बोलकर पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह भी कर चुके हैं |
क्या भारत का शासन तंत्र इनके जैसे कहीं भी बोलने वाले लोगों के लिए क्या कोई प्रोटोकॉल निर्धारित नहीं कर सकता है , और यदि है तो फिर इनके खिलाफ कोई कार्यवाही क्यों नहीं होती ?

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश की सुरक्षा पर खुलेआम  सवालिया निशान लगाने की अनुमति तो किसी को नहीं दी जा सकती है |

 " बोलिए ज़रूर मगर सरकार और विमर्श को बाज़ार के हाथ गिरवी रख चुके मीडिया के सामने नहीं | "

|| " सत्यमेव जयते " ||


आज बात नवरात्री के पर्व की |
तेजी से बदलते समाज में त्योहारों का महत्त्व भी बदलता जा रहा है , हर पीढी का अपना नजरिया होता है जो इन पर्व - परम्पराओं को आगे बढ़ाता है | पिछले दस - बारह वर्षों में ही लगता है कि पूरी पीढ़ी की सोच ही बदल गयी है |


जरा देखें .....................


1999 की नवरात्री  :-----


उत्तर भारत के एक मध्यम आकर के शहर में नवरात्री की तैयारियां चल रही हैं |
लोगों में चर्चा के विषय कुछ इस तरह के हैं |
१. इस बार फलाने समिति वालों ने ज़बरदस्त सजावट की है , अजी पूरा कारगिल माता के चरणों में समा लिया है |
२. कुछ लोगों ने कहा कि इस बार तो फलानी कॉलोनी वालों ने वैष्णो देवी से जागरण वालों को बुलवाया है अबकी धूम मचेगी जागरण में |
३. विभिन्न गुटों में चर्चा है कि चंदे के पैसों से माता के एक पुराने मंदिर का जीर्णोधार भी करवा दिया जाये |
४. दर्शनार्थी स्त्रियों के लिए सभी पंडालों में एक विशेष व्यवस्था प्रशासन की ओर से की जा रही है |
५. दान और चढावे के पैसे से सामाजिक कार्यों को बढ़ावा दिए जाने कि कार्य योजना बनी है | 





 2009 की नवरात्री :----- 


१. आम लोगों में चर्चा गरम है की फलाने मंडल वाले इस बार दुबई से महँगी वाली  चीयर लीडर को बुला रहे हैं |
२. अबकी कुछ मंडलों में देवी के रूप में ' मायावती माता ' और ' सोनिया माता ' भी देखी जाएँगी |
३. सभी पंडालों में गरबा खेलने वाले ' रास-प्रेमियों ' के लिए भी विशेष व्यवस्था की गयी है |
४.बहुत सारे लोंगों ने तो निर्णय किया है कि वो अपने व्रत के खान-पान , नियम आदि का पालन एकता कपूर टाइप टी.वी. सीरियलों के हिसाब से करेंगे |
५.सारे स्कूल और कॉलेज के छात्रों को विशेष निमंत्रण क्योंकि " लाखों रुपये खर्च करके उनके लिए ही तो कोबरा DJ " बुलाया जा रहा है |
६. इस बार दस बड़ी समितियों को २० करोड़ रूपये की Sponsorship मिली है |


 वाकई नयी पीढ़ी की सोच तो काफी बदल गयी है |




|| " सत्यमेव जयते " ||














कहते हैं कि सरलतम ही सर्वजनों की स्वीकृति प्राप्त करने में सक्षम होता है | ऐसी ही बात संस्कृति के संबंद्ध में भी कही जा सकती है |


आज शाम को यूँ ही रेडियो पर FM 93 .5  किसी कार्यक्रम में एक आर . जे  को श्री लालू प्रसाद यादव वाले बिहारी स्टाइल में मनोरंजन करते हुए सुना और यकीन मानिये कि माहौल में एक ज़बरदस्त विनोदी और स्वाभाविक असर पैदा हो गया | वैसे इस खास शैली को पूरे देश में चाहे वो हिमाचल हो या हैदराबाद ,गुवाहाटी हो या फिर महाराष्ट्र बगैर किसी सांस्कृतिक भेदभाव या पूर्वाग्रह के सुना जाता है | इसे हम क्या कहेंगे ? मैं तो इसे सरलता की सफलता ही कहना चाहूँगा | श्री लालू प्रसाद यादव के राजनैतिक व्यक्तित्व को चाहे हम कैसे भी देखें लेकिन इस प्रकार की वार्ता शैली को मीडिया ने एक सांस्कृतिक रूप देकर काफी मशहूर तो बना ही दिया है | पहले - पहल इसका भले ही मजाक बनाया जाता रहा हो लेकिन अब इसको मनोरंजक समझा जाता है |




संस्कृतियों की विभिन्नता में वो ही संस्कृति अपना वजूद बनाये रख सकती है जो कि सरलतम रूप में जनसामान्य की अभिलाषाओं को पूरी करने में समर्थ हो , साथ ही तेजी से बदलती दुनिया में खुद को तमाम कर्मकांडों से मुक्त करने की पहल दिखलाये | कई बार हमारी अपनी भारतीय संस्कृति इस बात में ही पिछड़ जाती है | संस्कृति के नाम पर न जाने कितने ही बेमतलब और बोझिल कर्मकांड युवाओं के मन पर थोप दिए जाते है , फिर जब इनके बोझ से दबा युवामन दुनिया की अन्य संस्कृतियों की तरफ देखता है तो उसे उनमें एक ज़बरदस्त स्वच्छंदता दिखलाई पड़ती है जिसको पाने के आवेग में उसकी स्थिति कई बार भौंडी और मर्यादा की सीमा को भी पार कर जाती है |





यहाँ पर यह बात विशेष है कि कोई भी सांस्कृतिक व्यवहार लोगों द्वारा तभी स्वीकृत हुआ है जब उसने मन की स्वतंत्रता को स्वीकार किया और किसी पर अपने उपदेश नहीं थोपे | आज हम अपनी संस्कृति के उपादानों को अपने ही लोगों द्वारा धीरे - धीरे बहिष्कृत होते हुए देख रहे हैं | हर प्रकार के विदेशी पर्व , तौर - तरीके भारतीय त्योहारों और बैठकों का स्थान लेते जा रहें हैं | आज का युवा यह देख कर चिंतित भी हो रहा है लेकिन फिर भी इसको बनाये रखने से कतरा रहा है, आखिर क्यों ?




ज़वाब इस बात में समाहित है कि क्या हम कभी संस्कृति को मठाधीशों , निक्कमे और बेमतलब के विद्वानों और बेबुनियाद कर्मकांडों से मुक्त कर पाने में सक्षम हैं ?




सरलता को स्वीकार किया तो हम विश्व पर राज कर सकते है |
 
|| " सत्यमेव जयते " ||


आज हिंदी दिवस है , बहुत सारे लोगों के लिए ये हिंदी की बेचारगी का रोना-रोने का सर्वश्रेष्ठ दिन है |


भाषा हमें संस्कार देती है और मातृभाषा तो एक प्रकार से साक्षात् माता की ही भूमिका का निर्वहन करती रही है | हमारी हिंदी ने हमें हमेशा संघर्ष के ही संस्कारों से दीक्षित किया है |




  जब हम अपने वर्तमान अस्तित्व को देखते हैं तो यही पाते हैं कि हिंदी ने ही हमारे सामाजिक संस्कारों का परिष्कार किया है | भारत की स्वतंत्रता से लेकर सामाजिक सुधार के आन्दोलनों की भाषा हमारी हिंदी ही रही है , सारांश यह कि हिंदी ने हमें हमेशा आतताईयों के विरूद्ध लड़ने की और विजेता बनने की प्रेरणा और मार्गदर्शन दिया है |


आज हमारी हिंदी प्रतीक बन चुकी है | हिंदी प्रतीक है भारत माता को जड़ता और गुलामी से मुक्त कराने के संघर्ष की , हिंदी प्रतीक है धरती को पर्यावरण असंतुलन से बचाने की , हिंदी प्रतीक बन चुकी है पृथ्वी को लालच पूर्ण दोहन के विरोध की , हिंदी प्रतीक है निर्मम शासकीय सत्ता के विरूद्ध संघर्ष की , हिंदी प्रतीक बन चुकी न्याय एवं समानता के उद्देश्यों की प्राप्ति की |



 ऐसी महान भाषा में ही इस प्रकार के उद्देश्यों को प्राप्त करने क्षमता है | भविष्य में सभी संघर्ष और आंदोलनों की भाषा हमारी भारतीय भाषायें एवं हिंदी ही होगी , अतः हिंदी कोई बेचारगी की भाषा नहीं है रोना बंद कीजिये और संघर्ष करते रहिये |


भारतीय भाषायें भारत के स्वप्नों की वाहक बन सकती हैं |


|| " सत्यमेव जयते  " ||






चाहे हम सहमत हों अथवा नहीं लेकिन " The legend of Bhagat Singh " फिल्म का यह कालजयी संवाद अपने आप में समस्त बदलावों के प्रारंभ की व्याख्या कर देता है |


आज एक राष्ट्र के रूप में हमारे अस्तित्व पर जो संकट आन पड़ा है उसकी आहट न तो देश के नीति-नियंताओं को सुनाई पड़ रही है और ना ही हमारी जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा उसके बारे में कोई अनुमान लगाने में समर्थ है | भारत की वर्तमान व्यवस्था में इन सकटों का सामना करने एवं विश्व - पटल पर राष्ट्र को गौरवशाली रूप में स्थापित करने के लिए आज जो स्वर चाहिए वो किसी बड़े धमाके के रूप में ही होना चाहिए |


संयमित और मीठी - मीठी चापलूसी भरी बातें करके ' महात्मा ' बना जा सकता है किन्तु विजेता बनने और जन - गण - मन के गौरव और स्वाभिमान की स्थापना करने के लिए हमें अपनी स्वर लहरियों को तलवार की ही धार देनी होगी | आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस राष्ट्र के लिए यह बीड़ा कौन उठाएगा ? लेकिन यहाँ जवाब किसी और से  नहीं बल्कि स्वयं से पूछना है |


जवाब भी बड़ा ही सीधा सा है , देशहित में जो भी बात हमें उचित जान पड़ती है उसको डंके की चोट पर एक बड़े धमाके साथ सबके सामने लाइए | जो बात सत्यता की पुष्टि करती हो और देशहित में प्रधान हो हमें उसके लिए चाहे कितनी भी बड़ी छद्म नैतिकता को भूलना पड़े , स्वीकार्य है |




|| " सत्यमेव जयते  " ||