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आज हिंदी दिवस है , बहुत सारे लोगों के लिए ये हिंदी की बेचारगी का रोना-रोने का सर्वश्रेष्ठ दिन है |


भाषा हमें संस्कार देती है और मातृभाषा तो एक प्रकार से साक्षात् माता की ही भूमिका का निर्वहन करती रही है | हमारी हिंदी ने हमें हमेशा संघर्ष के ही संस्कारों से दीक्षित किया है |




  जब हम अपने वर्तमान अस्तित्व को देखते हैं तो यही पाते हैं कि हिंदी ने ही हमारे सामाजिक संस्कारों का परिष्कार किया है | भारत की स्वतंत्रता से लेकर सामाजिक सुधार के आन्दोलनों की भाषा हमारी हिंदी ही रही है , सारांश यह कि हिंदी ने हमें हमेशा आतताईयों के विरूद्ध लड़ने की और विजेता बनने की प्रेरणा और मार्गदर्शन दिया है |


आज हमारी हिंदी प्रतीक बन चुकी है | हिंदी प्रतीक है भारत माता को जड़ता और गुलामी से मुक्त कराने के संघर्ष की , हिंदी प्रतीक है धरती को पर्यावरण असंतुलन से बचाने की , हिंदी प्रतीक बन चुकी है पृथ्वी को लालच पूर्ण दोहन के विरोध की , हिंदी प्रतीक है निर्मम शासकीय सत्ता के विरूद्ध संघर्ष की , हिंदी प्रतीक बन चुकी न्याय एवं समानता के उद्देश्यों की प्राप्ति की |



 ऐसी महान भाषा में ही इस प्रकार के उद्देश्यों को प्राप्त करने क्षमता है | भविष्य में सभी संघर्ष और आंदोलनों की भाषा हमारी भारतीय भाषायें एवं हिंदी ही होगी , अतः हिंदी कोई बेचारगी की भाषा नहीं है रोना बंद कीजिये और संघर्ष करते रहिये |


भारतीय भाषायें भारत के स्वप्नों की वाहक बन सकती हैं |


|| " सत्यमेव जयते  " ||

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