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तीन राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों की पराजय के बाद एक बार फिर से भाजपा की हार को लेकर हिंदुत्ववादी हलकों में भारत की आम जनता को कोसने की कवायद शुरू हो गयी है | हिन्दू बहुल जनता को कोसने की यह प्रक्रिया हर चुनावी हार के बाद शुरू कर दी जाती है | प्रत्येक चुनावी हार के बाद हिंदूवादी राजनीति का दम भरने वाले जनता की आँखों पर पट्टी बंधे होने की दुहाई तो देते नज़र आते हैं , लेकिन आखिर इन हारों की वजह क्या है ? इस बात की ईमानदारी से पड़ताल करने  की ना तो कोई कोशिश ही की जाती है और ना ही किसी सुधार प्रक्रिया की शुरुआत के ही कोई लक्षण देखने को मिलते हैं क्योंकि इस पूरे प्रयास से हिंदुत्व की राजनीति का नव - सृजन करने में जो प्रसव पीड़ा होगी उसे सहने का साहस हिंदुत्व की विचारधारा को अपना बताने वाली शक्तियां खो चुकी हैं | अब प्रश्न यह उठता है कि क्या हिंदुत्व की राजनीति बदलते भारत में अप्रासंगिक हो चुकी है ?

इस बात को समझने के लिए हमें हिंदुत्व की राजनीति के मायने समझने होगें | इस बात में कोई शक नहीं है कि आज  भी हिंदुत्व पीड़ित है | विगत सहस्त्रों वर्षों से चली आ रही सनातन संस्कृति कराह रही है | आज हिंदुत्व की जो पीड़ा है वो बहुआयामी है किन्तु इस पीड़ादायक परिवेश में हिंदुत्व को जितनी क्षति बाहरी आक्रमणों से हुई है उससे कहीं ज्यादा अंदरूनी कुसंगतियों से पहुंची है और इसी दुःख को दूर ना कर पाने की सजा एक आम हिन्दू भाजपा जैसी हिन्दू हित की बात करने वाली पार्टियों को चुनावी मत ना देकर देता रहा है | भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियाँ देश के आम हिन्दू मन को समझ पाने में असफल रही हैं और यही नासमझी आने वाले वक़्त में भी इनकी हार का ही कारण बनेगी | हिंदुत्व जागरण की बात करने वाली भाजपा ने आधुनिक हिंदुत्व की परिभाषा में अगर आज सत्ता में बैठी कांग्रेस के इतिहास से ही कुछ सबक लिया होता तो आज संसद के गलियारों से देश में भाजपा की गूँज सुनाई दे रही होती |


अपने आरम्भ से ही कांग्रेस ने अपनी छवि नरम हिंदुत्व की बना रखी थी , तुष्टिकरण की तीव्र शुरुआत तो पिछले बीस - पचीस  सालों में ही देखने को मिलती है इससे पहले भी कांग्रेस ने तुष्टिकरण तो किया था लेकिन इसका कारण कभी राजनैतिक रूप से चुनाव जीतना नहीं रहा | १८५७ के ग़दर के विफल हो जाने के बाद से ही देश में हिन्दू और मुसलमानों ने अपने लक्ष्य अलग - अलग कर लिए थे जहाँ हिंदुत्व ने सुधारवादी आन्दोलनों के माध्यम से स्वधर्म परिष्कार का रास्ता चुना वहीं मुसलमान हमेशा ही मुगलकालीन वैभव को वापस लाने के लिए आज़ादी चाहते थे | कांग्रेस ने अपनी शुरुआत में इन दोनों को एक मंच पर लाने की कोशिश की लेकिन तुष्टिकरण की घातक नीतियों के बावजूद मुसलमान , मुस्लिम लीग के साथ हो लिए | इससे कांग्रेस में सबसे ज्यादा प्रभाव सुधारवादी आंदोलनों से जुड़े हिन्दू नेतृत्त्व का बढा | इसको आगे बढ़ाने का काम किया आर्य समाज और इसी तरह के दूसरे समाज सुधारक आंदोलनों से जुड़े नेताओं ने ,जिनके प्रयासों ने देश पर कांग्रेसी सत्ता सुनिश्चित करने में अपनी महती भूमिका निभाई | 

अगर हम आज़ादी के पहले के कांग्रेस के नेतृत्त्व को देखें तो यह कहा जा सकता है संगठन से जुड़े अधिकांश छोटे - बड़े नेता  देश की आज़ादी के साथ - साथ सुधार आंदोलनों के अगुआ भी थे जिन्होंने हिंदुत्व को कुसंगतियों से दूर करने में अतुलनीय भूमिका निभाई | स्वतंत्रता के बाद भी इन्ही नेताओं और संचालकों के पुण्य कर्मों को स्मृति में रखकर हिन्दू जनमानस ने साल दर साल कांग्रेस को राजनैतिक और सामाजिक संगठन के क्षेत्र में अग्रणी समझते हुए देश की सत्ता सौंप दी | सुधार आन्दोलनों से निकले हिन्दू क्षत्रपों की अपील इतनी दमदार होती थी कि इस काल में किसी और राजनैतिक दल के लिए हिंदुत्व की मुख्यधारा में खुद को साबित करने का मौका ही नहीं होता था | कांग्रेस के संगठन से जुड़े इन्ही नेताओं ने सुधार आन्दोलनों में देश और धर्म के परिष्कार की लडाई लड़ी थी , जात - पात का खात्मा करने की कोशिश , भूदान और भूमि सुधार , वैदिक काल के गौरव से आम हिन्दू जन - मानस को जोड़ने का प्रयास , धार्मिक पोंगापंथ और पाखंड पर करारी चोट , आधुनिक शिक्षा और स्त्री की स्थिति में सुधार , सती प्रथा और बाल विवाह जैसी कुरीतियों पर रोक इत्यादि अनेक प्रयास कांग्रेस से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं ने किया था और भारत का हिन्दू जनमानस सदैव ही इनके आग्रह को मतों के रूप में कांग्रेस तक पंहुचा कर अपना आभार व्यक्त करता रहा |


बदलते समय के साथ कांग्रेस ने तुष्टिकरण की राह चुनी और इसी के साथ राजनीति में भाजपा और सहायक हिंदूवादी शक्तियों के लिए भी स्थान बन गया | भाजपा की राजनीति को स्थापित करने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका को नकार देना एक बहुत बड़ी भूल होगी | संघ भी एक सुधार वादी आन्दोलन ही रहा है और आज जब हम भाजपा के प्रति हिन्दू जनमानस के एक वर्ग की कट्टर सहानुभूति देखते हैं वो कहीं ना कहीं संघ के सामाजिक सरोकारों के प्रति श्रद्धा के कारण ही है | भाजपा एक समय अरुणाचल से लेकर कर्नाटक में अपनी राजनैतिक उपस्थिति दर्ज कराने में सक्षम रही तो उसका भी रास्ता संघ की नीतियों से होकर ही गुजरता रहा है | संघ द्वारा राष्ट्र निर्माण में किये गए योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता है |

लेकिन इन सबके बावजूद संघ और उसके अनुषंगी संगठन भारत के विशाल हिन्दू जनमानस का प्रतिनिधि बन पाने में असमर्थ रहे  हैं  तो इस बात के निहितार्थ तलाशने की भी आवश्यकता है | संघ ने हिंदुत्व के प्रति अपनी घोषित नीति में इतने छेद कर रखें हैं कि सारे प्रयासों की हवा ही निकल जाती है | संघ और भाजपा की सबसे बड़ी विफलता हिन्दुओं को एक मंच पर ला पाने की रही है | अन्य सुधार आंदोलनों ने जहाँ हिन्दू धर्म की आतंरिक कमजोरियों पर जोरदार प्रहार किया वहीं संघ ने अपना सारा जोर हिन्दुओं को विदेशनीति समझाने में लगा दिया | जब गाँव के दलित को गाँव में पूजा - पाठ करने के लिए गाँव के ही मंदिर में ही प्रवेश नहीं मिलेगा तो ऐसे में कौन से हिंदुत्व की दुहाई देकर उसे राम - मंदिर और राम सेतु के मुद्दे पर साथ रखा जा सकता है | भाजपा और संघ - विहिप में अंदरूनी स्तर पर मठाधीशों ने कब्ज़ा जमा कर रखा है जहाँ आज भी संकीर्ण ब्रह्मणवाद और मनुवादी विचारधारा हावी है | ऐसी ही विचारधारा ने संघ को हिन्दू जनमानस का मुख्य प्रतिनिधि बनने से रोक दिया है | असल में भाजपा , संघ - विहिप के पास राष्ट्रनीति और विदेशनीति तो बहुत अच्छी है लेकिन धर्मनीति बेहद कमजोर | इस धर्मनीति में बहुत बार विद्वेष और फासीवाद हावी हो जाता है | कई बार ऐसा हुआ है कि राजनैतिक मजबूरियों के चलते फासीवादी और कट्टर व्यक्तियों के हाथ में नेतृत्त्व सौपं दिया जाता है जिसका सहिष्णु और अत्यधिक संवेदनशील हिन्दू समाज के मानस पर बुरा प्रभाव पड़ता है |


आज हिन्दू समाज की कुरीतियों को लेकर दिनरात हिंदुत्व की माला जपने वाली भाजपा और संघ - विहिप कितनी सक्रीय ? है यह किसी से छुपा नहीं है | भाजपा और संघ को वैलैनताइन दिवस पर उधम मचाने वाले बेहुदे बजरंगी तो स्वीकार्य हैं पर जाटों की क्रूर खाप पंचायतो के फरमान पर चुप्पी साध लेना ही श्रेयस्कर लगता है | ऐसी राजनीति को हिन्दू कैसे स्वीकार कर सकता है | जब बात भाजपा , संघ - विहिप की आती है तो एक बारगी हिन्दू का मन कहता है कि ये राजनैतिक शुचिता के पर्याय बन सकते थे लेकिन इनका आचरण अब सम्मान के योग्य नहीं | कई बार जब पानी सर से ऊपर निकल जाता है तो आम हिन्दू स्थानीय संभावनाओं को ध्यान में रखकर अपना कीमती मत दे देता है | जहाँ तक भाजपा की बात है अब वो भी पूरी तरह से कांग्रेस की राह चल पड़ी है |

इस नयी राह पर धर्म और राष्ट्र सिर्फ वोट लेने के लिए हैं प्राथमिकता में बाज़ार और अमेरिका है | ऐसी भाजपा राम के नाम को केवल चुनावों के वक़्त याद करती है , सो रामभक्त हिन्दू ने बिसरा दिया तो रोष कैसा ? ऐसी भाजपा जब शिवसेना और अकालीदल जैसे क्षेत्रवादी राजनीति के विषैले मित्र बनती है तो भी हिन्दू उससे दूर चला जाता है | अगर इन्ही दुर्गुणों के साथ सरकार चलानी है तो हिन्दू  स्थानीय स्तर पर हिंदुत्व की राजनीति करने वाले कांग्रेसियों को भी चुन लेता है |

भाजपा आज भी देश के हिन्दू  मन की सबसे बड़ी उम्मीद बन सकती है लेकिन उसे यह समझना पड़ेगा कि हिंदुत्व की राजनीति के मायने और भी हैं , जो कि आज पनप रही संकीर्णता को परे धकेल कर अपना अस्तित्व सिद्ध करना चाहती है बस एक सही संगठन की पहल की प्रतीक्षा है |

|| " सत्यमेव जयते " || 





राष्ट्र संकट में घिरा है | धर्म खतरे में है लेकिन सत्ता के अधिनायक धर्मनिरपेक्षता के खतरे में होने का स्वांग रच रहे हैं | भारतीय धर्मनिरपेक्षता सम्पूर्ण विश्व में अद्वितीय है , यह   धर्म को ना सिर्फ सत्ता से बेदखल कर देती है बल्कि धर्म को राज्य प्रायोजित हथियार बनाकर लोकतंत्र का सौदा करने से भी बाज़ नहीं आती | संविधान के आदेशों और सुझावों को भी इसने पद-दलित करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी है |


 भारत एक धर्म सापेक्ष राष्ट्र है जबकि जैसे ही इसे धर्मनिरपेक्ष बनाया जाता है ये ' इंडिया ' बन जाता है | ' इंडिया ' है तो भोग की अति है , पश्चिमी नंगापन है , इस्लामी आतंकवाद है , हिन्दू प्रतिक्रियावाद है , नक्सलवाद है , माओवाद है , भय है , भ्रष्टाचार है ,  भूख है , गरीबी है ,विषमता है , वितंडावाद है ,विखंडनवाद है , कानून हाशिये पर है और जनसामान्य व्यथित होकर बाहुबल की शरण में जा चुका है | इन सबके बावजूद ' इंडिया ' को कोई फर्क नहीं पड़ रहा क्योंकि यह ' इंडिया ' इन समस्याओं से मुक्त महानगरों में भोगविलास में लिप्त है | ' इंडिया ' धर्मनिरपेक्ष है इसीलिए अधर्म पर चुप रहना श्रेयस्कर समझता है |


विश्व में ऐसे किसी राष्ट्र की मिसाल खोजनी मुश्किल है जिसमें राज्य ने धर्म को इस कदर हाशिये पर रख दिया हो | सिकंदर से लेकर ओबामा तक तेहरान से लेकर नास्तिक क्रेमलिन तक किसी ना रूप में धर्म सत्ता से निर्देशित होते रहे , किन्तु भारत में धर्म सत्ता निरंकुश राजनीती को निर्देशित करे यह सोचना भी संभव नहीं लगता | जिस देश का राष्ट्रपिता तक  धर्मनिष्ठ रहा हो उसकी शासन सत्ता आज धर्म का त्याग कर चुकी है | जब भी जन संघर्ष होता है धर्मनिरपेक्ष सत्ता अपने आडम्बर को सामने लेकर खडी हो जाती है और सारा दोष धर्म के मत्थे मढ़ दिया जाता है | धर्म की हानि होती रही है और सेकुलर ओछी राजनीती के गीत गाते रहे हैं |

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक , ओखा से लेकर इम्फाल तक की समस्याएं देश को पीड़ित कर रही हैं , राष्ट्र अंग - भंग की कगार तक जा पंहुचा है लेकिन धर्मनिरपेक्ष सत्ता को इससे क्या ? इनकी रोटी - पानी तो दिल्ली , कोलकाता , मुंबई जैसे महानगरों में रहने वाले उद्योगपति और वोटों के सौदागर चला रहे हैं | तुष्टिकरण इनका मूलमंत्र है , और वोटबैंक इनका घोषित लक्ष्य |  संविधान को ही धर्मनिरपेक्ष घोषित कर राष्ट्र के मूल धार्मिक स्वरुप को नष्ट करने की कोशिश जारी है | इसीलिए घोर अमानवीय कृत्यों पर भी संविधान चुप हो जाता है , न्यायपालिका मौन धारण कर लेती है और विवाद बरसों बरस जारी रहते हैं |


धर्म आधारित सत्ता के भी अपने खतरे हैं पाखण्ड और पोंगापंथ दोनों की ही अति हो सकती है | लेकिन क्या आज के जैसी परिस्थिति होती ? धर्मनिरपेक्षता के जिस स्वरुप को आज राजनीति भुना रही है उसे तो हम पश्चिम से आयातित भी नहीं कह सकते हैं | पश्चिम में धर्म ने राज्य को नियंत्रित करना छोड़ दिया इसीलिए आज पश्चिम ने विश्व के व्यापक विनाश की तैयारी कर ली है , विज्ञान को कल्याण से ज्यादा भोग और साम्राज्यवादी अभिलाषाओं को पूर्ण करने में लगा दिया | इस्लामी जगत में राज्य अब भी कमोबेश धर्म के नियंत्रण में अवश्य है लेकिन इस्लाम का दर्शन ही किसी आधुनिक राज्य को नियंत्रित करने की योग्यता नहीं रख पाने के कारण शासन में सीमित दखल ही दे पाता है | इस परिदृश्य में भारत में धर्म आधारित व्यवस्था लागू करने के उपाय क्या हैं ?

भारत सदैव एक धर्म सापेक्ष राष्ट्र रहा है | जब जब धर्म की हानि हुई है तब किसी ना किसी रूप में सुधारकों ने चाहे वो बुद्ध रहे हों या महावीर , आदि शंकराचार्य रहे हों या फिर राजाराम मोहन राय रहे हो , महर्षि दयानंद रहे हों , स्वामी विवेकानंद रहे हों ,श्री अरविन्द घोष हों , या फिर पूजनीय बापू और आंबेडकर रहे हों राज्य सत्ता को ना केवल नियंत्रित किया बल्कि धर्म में पनपते पाखंड और निकृष्टता पर करारी चोट भी की | यहाँ तक कि धर्म ने आततायी हमलावरों और बादशाहों को भी मध्यम मार्ग अपनाने पर मजबूर कर दिया | हम कह सकते हैं कि धर्म अपनी व्याधियों को समय के साथ - साथ स्वयं दूर करने में सक्षम है लेकिन ठीक यही बात निरंकुश धर्मनिरपेक्ष सत्ता के लिए नहीं कही जा सकती क्योंकि उस पर कोई अंकुश नहीं है |

आज फिर से भारत में एक धर्म सापेक्ष व्यवस्था को स्थापित करने की आवश्यकता है लेकिन शोषण की आदी हो चली सत्ता इसे स्वीकार किस रूप में करेगी ? यह एक यक्ष प्रश्न है |

|| " सत्यमेव जयते " || 












विभाजन के बाद से ही देश जिन समस्याओं से सर्वाधिक पीड़ित है , कश्मीर उनमें सर्वोपरि है | कश्मीर की समस्या का हल स्वतंत्रता के ६२ वर्षों के बाद भी ना होना हमारी रीढ़विहीन राजनीती को ही दर्शाता है | कश्मीर की समस्या पर राजनीती पिछले छः दशकों से चली आ रही है लेकिन वैश्विक आतंकवाद के इस नए दौर में इसके मायने बदल गए हैं | इस नए दौर में कश्मीर ने भारतीय मुसलमानों की एक कट्टर पीढ़ी को आतंकवादी कृत्यों को  न्यायोचित ठहराने में बड़ी मदद की है  | आज के कथित सेकुलर विश्लेषक इस बात का दावा बड़े जोर शोर से करते रहे हैं कि भारतीय मुसलमानों  का वैश्विक आतंकवाद से कोई लेना देना नहीं रहा है बल्कि अब जो आतंकी कार्यवाहियों में लिप्त पाए जाते हैं उनका उभार अयोध्या और गुजरात दंगों जैसी कार्यवाहियों की प्रतिक्रिया मात्र है | वास्तविकता के धरातल पर ऐसे लोग जेहादी कृत्यों को सिर्फ इसलिए जायज़ ठहराने की मांग करते हैं कि भारतीय मुसलमानों का एक कट्टरपंथी तबका न सिर्फ इनके प्रति सहानुभूति रखता है बल्कि मामला वोट बैंक से भी जुड़ा हुआ है | यहाँ पर यह कहना मुनासिब होगा कि बहुसंख्यक मुसलमानों के वोट बैंक को कट्टरपंथी तबका ही प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से नियंत्रित करता रहा है |


ऐसे परिप्रेक्ष्य में कश्मीर की समस्या का वैश्विक आतंकवाद से क्या लेना देना रहा है ये जानने के लिए हमें दोबारा , इतिहास को समझने की कोशिश करनी पड़ेगी | 1980 के दशक के अंतिम वर्षों में जब कश्मीर में इस्लामिक आतंकवाद ने पैर पसारना शुरू किया तब से लेकर आजतक यह ७०००० हजार मासूमों की हत्या कर चुका है लेकिन छोटे - छोटे फर्जी मुठभेडों के मुद्दे पर मानवाधिकार के आंसू बहाने वाले मुस्लिम संगठनों ने आज तक इसकी निंदा में ना तो कोई कोई प्रस्ताव ही रखा है और ना ही बात बात पर फतवा जारी करने वाले इस पर कोई कारगर पहल ही कर सके हैं |

बदले परिप्रेक्ष्य में भारतीय मुसलमानों की एक बड़ी संख्या कश्मीर को हिन्दू - मुस्लिम समस्या के रूप में देखने से इनकार कर रही है | अब कश्मीर के संघर्ष को एक नया नाम दिया जा रहा है जिसमें कश्मीर की जंग को भारतीय मुसलमानों की नज़र में शोषण और अन्याय के खिलाफ युद्घ की संज्ञा देने का निरर्थक और दण्डनीय प्रयास किया जा रहा है | इस काम में डॉ जाकिर नाइक जैसे अरब देशों के पैसों पर पलने वाले कुप्रचारियों से प्रभावित होकर आजकल पढ़ेलिखे मुस्लिम युवा तेजी से लिप्त हो रहे हैं | जेहाद का यह नवीनतम रूप बेहद खतरनाक है |





इसी कड़ी में कश्मीर की आतंकी कार्यवाहियों की तुलना देश में बढ़ते नक्सलवाद से भी की जा रही है | लेकिन कश्मीर में आतंकवाद की हालत को बखूबी समझने वाले जानकार आज भी इस बात से वाकिफ हैं कि कश्मीर विवाद की मुख्य जड़ विश्वव्यापी इस्लामी आतंकवाद का ही प्रसार है | इसकी बानगी कश्मीर में उपद्रव काल से भगाए गए ४००००० लाख कश्मीरी पंडितों से लेकर हाल ही में अमरनाथ भूमि आन्दोलन को देखने से ही मिल जाती है | इस बात के क्या कारण हैं कि जब भी पाकिस्तानी हुक्मरान इस्लामाबाद से कश्मीर के प्रति अपनी नापाक प्रतिबद्धता दर्शाते रहते हैं तो विरोध में कभी भी भारतीय मुसलमानों का कोई स्वर सुनाई नहीं देता है | अभी हाल ही में अमरनाथ भूमि आन्दोलन के दौरान भी जबकि समस्त देश आंदोलित था , भारतीय मुसलमानों की चुप्पी भी नापाक कश्मीरी इस्लामवादियों के पक्ष में दिखलाई पड़ती है |  ऐसे में जब पूरा विश्व कश्मीर समस्या को हिंदू बहुल भारत और मुस्लिम बहुल कश्मीर और पाकिस्तान के बीच की समस्या मानता रहा है जिसकी अभी हाल ही में लीबिया के सिरफिरे शासक कर्नल गद्दाफी के बयानों से पुष्टि होती है , भारतीय मुसलमान इसको इस्लाम से अलग मसला बनाने की मुहीम छेड़े हुए हैं | इस कट्टरपंथी तबके ने कभी भी महबूबा मुफ्ती जैसी पाकिस्तान परस्त नेताओं और हुर्रियत जैसी संस्थाओं के खिलाफ चूं तक भी नहीं की है |

जबकि भारतीय मुसलमानों का यह तबका भारत में नरेन्द्र मोदी जैसे नेताओं के खिलाफ आग उगलता रहता है , कश्मीर में हर रोज़ मारे जा रहे दसियों बेक़सूर नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों की शहादत पर चुप्पी साधे रहता है किन्तु बटला हाउस और सहाबुद्दीन इनकाउन्टर मसले पर ट्रेनों में भर - भरकर दिल्ली पहुँच जाता है | राष्ट्रीय सरोकारों पर मुसलमानों की चुप्पी और भी घातक रुख अख्तियार कर रही है | बांग्लादेशियों की घुसपैठ से लेकर मुंबई हमले तक को हिन्दू षड़यंत्र करार देने वाले कट्टरपंथी मुसलमानों के लिए विरोध का मतलब सिर्फ अमेरिकी विरोध तक ही सीमित है | कश्मीर में जारी धार्मिक हिंसा को यही तबका नक्सली हिंसा और पूर्वोत्तर में जारी सांस्कृतिक और भाषायी हिंसा से जोड़कर दिखलाता रहता है |



भारतीय मुसलमानों के कट्टरपंथी तबके का एक मकसद यह है कि कश्मीर में चल रहे जिहाद को भारतीय मुसलमानों की दुश्वारियों से जोड़कर विश्व के मुस्लिम देशों की सहानुभूति हासिल की जा सके | लेकिन वास्तविक हकीकत इससे कहीं ज्यादा भयावह है ये कट्टरपंथी तबका कश्मीर के संघर्ष को आधारशिला बनाकर भविष्य में मुस्लिम बहुल इलाकों में एक समानांतर व्यवस्था की वकालत करता है जिसमें खाड़ी के देशों वित्तीय सहायता मिलने की व्यवस्था होगी , चीन और पाकिस्तान की घेरेबंदी में भारत के विभाजन की तैयारी की जायेगी | कश्मीर की हिंसा से ग्रस्त वादी शनैः शनैः दुनिया भर के जिहादियों की मनपसंद जगह बनती जा रही है | हर दिन हालात हाथ से बाहर होते जा रहे हैं अब तो कश्मीर का मुद्दा भारत की आम जनता के बीच में से भी अपना अस्तित्व खोता जा रहा है इन हालातों को देखकर लगता है एक बार फिर से राष्ट्रवादी और अमन पसंद मुसलमानों को आगे आकर बहुसंख्यक जनता के साथ विश्वास बहाली के लिए संप्रभुता के साथ जुड़े इस मसले को उठाना चाहिए , नहीं तो इस देश का इतिहास उन्हें कभी माफ़ नहीं कर पायेगा |


|| " सत्यमेव जयते " ||



हर रोज़ इस्लामी कुंठाओं की एक बानगी देखने को मिल जा रही है |
इसी की अगली कड़ी में  इस्लामी देशों द्वारा कश्मीर मामलों के लिए विशेष दूत  की नियुक्ति का एक खटराग और भी जुड़ गया है | रह रहकर इस्लामवादी अपना रंग दिखला ही देते हैं आखिर जब तक पूरी दुनिया दार - उल - इस्लाम के झंडे के नीचे नहीं आ जाती तब तक ये इस्लामिक साम्राज्यवाद अपने षड्यंत्रों से चूकने वाला नहीं है | इन ख़बरों पर तथाकथित इस्लामिक उदारता के रहनुमा मौन हैं कोई फतवा नहीं है और शर्मनिरपेक्ष सरकार को अपनी ढपली बजाने से फुर्सत नहीं है , चीन का कुत्सित षड़यंत्र है और पश्चिम के लिए मात्र  बाज़ार को डावांडोल करने की एक परिस्थिति , ऐसे में कश्मीर के यदि नापाक हाथों की स्थिति यदि पैदा हो गयी है तो समझ लेना चाहिए राष्ट्रतत्व  धीरे - धीरे नपुंसक होता जा रहा है | इस्लाम के सबसे घृणित कृत्यों से परिचित यह देश ना सिर्फ अपने इतिहास को भूलता जा रहा है बल्कि इतिहास में इच्छानुसार परिवर्तन नीति - नियंताओं द्वारा वोटबैंक की राजनीती का सबसे घातक हथियार भी बन गया है |



बर्बर विचारधाराएँ आज विश्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गयी है , पश्चिम ने बन्दर के हाथ में उस्तुरा थमा कर ना केवल खुद के लिए मुसीबत मोल ली है बल्कि पूरी दुनिया को भी खतरे में झोंक दिया है लेकिन शांति पाठ पढ़ने वाली सरकारों की आखें नहीं खुलती दिख रही बल्कि संसाधनों पर इस्लामवादियों का पहला हक़ होने का असंवैधानिक जाप निरंतर जारी है | इस्लाम कुंठित हो चला है और इस्लामवादी व्यथित , गत १४०० सालों में दुनिया को बर्बरता के अलावा और कुछ ना दे पाने की कसक अब बौखलाहट में बदल चुकी है आखिर बदले भी क्यूँ ना ? सम्पूर्ण विज्ञान जगत बिना इस्लाम के आगे बढ़ चला है , कला और संस्कृति से कोई वास्ता अब बचा नहीं , पर्यावरण की चिंता और पृथ्वी पर जीवन का कोई मोह नहीं बस एक ही रटा - रटाया जुमला दोहराया जा रहा है कि जगत अज्ञानी है सिर्फ ' कुरान सत्य '  ! ऐसा दर्शन आखिर कैसे सह - अस्तित्व को मान्यता दे सकता है , तो सीधा हिसाब यह है कि किसी प्रकार से इस आगे बढ़ चले विश्व को घसीट कर पुराने ढर्रे पर खींच कर वापस लाया जाए ताकि इस्लामी श्रेष्ठता साबित की जाये | अब ' जिहाद ' करने के लिए इससे बड़ा मानदंड बनाने की क्या आवश्यकता है  ?



गति चाहे धीमी ही सही लेकिन अब बर्बरता विरोधी चेतनाएं भी सजग हो रही हैं लेकिन एक स्वयम्भू राष्ट्र के रूप में हमारा अपना नजरिया निहायत ही शुतुरमुर्गी ही है , ऐसे में अगर आज कश्मीर के अस्तित्व पर संकट के बादल हैं तो कोई विशेष आर्श्चय की बात तो नहीं , कल को यदि पाकिस्तान से बांग्लादेश को जोड़ने के लिए अगर एक इस्लामिक गलियारा बनाये जाने के पक्ष में भी दूत ( इस्लामी जेहादी ) अगर मार्क्सवादियों के समर्थन से भारत में मुहीम शुरू कर भी दें तब भी मत चौंकियेगा  , आखिर धार्मिक समरसता की और भी कीमत चुकाई जानी बाकी ही है | आज लड़ाई हथियारों से कम और विचारों से ज्यादा लड़ी जा रही है | देश का मानस सदैव ही विचारशील रहा है , विचारों ने ही हमें विश्वगुरु बनाया है अब ऐसे में जबकि सत्य सनातन संस्कृति एक वैश्विक खतरे के सबसे वीभत्स रूप से जूझ रही है राष्ट्र व्यक्तिगत आहुतियाँ मांग रहा है , मातृभूमि सपूतों से आह्वान कर रही है कि बलिदान का वक्त आ चुका है अब आवश्यकता है कि हम तलवार की धार के साथ - साथ कलम को तेज कर लें |


|| " सत्यमेव जयते " ||


आजकल समाज के बुद्धिजीवी और वर्ग में गाँधी जी को नोबल पुरस्कार क्यों नहीं मिला इस बात पर बड़ी जोरदार चर्चाएँ हो रही हैं | सभी कथित बुद्धिजीवी इस मामले पर अपनी - अपनी टेर लगाये हुए हैं , अब चलिए आज हम भी इसी बात पर चर्चा कर लेते हैं शायद दिमाग के कुछ गड़बड़झाले ही सुलझ जाएँ |


" नोबल पुरस्कारों की स्थापना अल्फ्रेड नोबल ने की थी जो की डायनामाइट का भी अविष्कारक था , अल्फ्रेड नोबल ने डायनामाइट के अविष्कार के बाद पूरी दुनिया के युद्धरत देशों को इसे बेचकर बेपनाह दौलत अर्जित की | इसका प्रयोग बड़े पैमाने पर नरसंहार के लिए किया गया | जीवन के उत्तरार्ध में जब अल्फ्रेड नोबल बीमार रहने लगा , तभी एक दिन उनके भाई का इंतकाल हो गया | अगले दिन के अखबारों में गलती से भाई की जगह अल्फ्रेड नोबल के मरने की खबर छाप दी गयी |
सभी प्रमुख समाचार-पत्रों का शीर्षक निम्न था ....................


" सदी का सबसे क्रूर हत्यारा मर गया , ईश्वर उसे नर्क में भी जगह न देगा "


इस शीर्षक को पढने के पश्चात् नोबल ने सोचा कि क्या दुनिया मुझे इसी तरह से याद रखेगी  ?, फिर उसने नोबल फाउंडेशन की स्थापना की और ताज्जुब तो इस बात का है कि वो दुनिया में शांति का पुरस्कार बाँट रहे हैं :  | ''


कई लोग कहते हैं कि महात्मा गाँधी जी को नोबल पुरस्कार नहीं मिला !!
मेरा कहना है कि अहिंसा के उस परमदूत के सामने नोबल जैसों की औकात ही क्या है ?


संयुक्त राष्ट्र संघ ने शांतिदूत गाँधी जी के प्रयासों को सम्मानित करते हुए प्रतिवर्ष २ अक्टूबर गाँधी जयंती को विश्व अहिंसा दिवस ( International Non - Violence Day ) घोषित किया है | वह विश्व इतिहास के पूज्य महात्मा हैं। भारत को उन पर गर्व करना चाहिए।


गाँधी जयंती के पावन अवसर पर बापू के आदर्शों को कोटि - कोटि नमन | 





 वर्तमान राजनीती में सबसे बड़ी कमी आदर्शवाद को व्यावहारिक पहलु में ना ढाल पाने की क्षमता का ना होना  है , भारत के लाल ' शास्त्री जी ' राजनैतिक शुचिता और आदर्शवादी व्यवस्था की एक मिसाल कायम कर गए हैं | 
शास्त्री जी का राजनैतिक जीवन आने वाले दिनों में हमारी राजनीती को प्रेरणा देने में सक्षम है | हम आशा कर सकते हैं कि भविष्य में यदि हमें भी राजनीती करनी है और कुछ सार्थक बदलाव लाना है तो शास्त्री जी के जीवन के पन्ने हमारी प्रेरणात्मक प्राथमिकताओं में अवश्य दर्ज होंगे |


भारत के लाल ' शास्त्री जी ' को जयंती के पावन अवसर पर कोटि - कोटि नमन |


|| " सत्यमेव जयते " ||