हर रोज़ इस्लामी कुंठाओं की एक बानगी देखने को मिल जा रही है |
इसी की अगली कड़ी में इस्लामी देशों द्वारा कश्मीर मामलों के लिए विशेष दूत की नियुक्ति का एक खटराग और भी जुड़ गया है | रह रहकर इस्लामवादी अपना रंग दिखला ही देते हैं आखिर जब तक पूरी दुनिया दार - उल - इस्लाम के झंडे के नीचे नहीं आ जाती तब तक ये इस्लामिक साम्राज्यवाद अपने षड्यंत्रों से चूकने वाला नहीं है | इन ख़बरों पर तथाकथित इस्लामिक उदारता के रहनुमा मौन हैं कोई फतवा नहीं है और शर्मनिरपेक्ष सरकार को अपनी ढपली बजाने से फुर्सत नहीं है , चीन का कुत्सित षड़यंत्र है और पश्चिम के लिए मात्र बाज़ार को डावांडोल करने की एक परिस्थिति , ऐसे में कश्मीर के यदि नापाक हाथों की स्थिति यदि पैदा हो गयी है तो समझ लेना चाहिए राष्ट्रतत्व धीरे - धीरे नपुंसक होता जा रहा है | इस्लाम के सबसे घृणित कृत्यों से परिचित यह देश ना सिर्फ अपने इतिहास को भूलता जा रहा है बल्कि इतिहास में इच्छानुसार परिवर्तन नीति - नियंताओं द्वारा वोटबैंक की राजनीती का सबसे घातक हथियार भी बन गया है |
बर्बर विचारधाराएँ आज विश्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गयी है , पश्चिम ने बन्दर के हाथ में उस्तुरा थमा कर ना केवल खुद के लिए मुसीबत मोल ली है बल्कि पूरी दुनिया को भी खतरे में झोंक दिया है लेकिन शांति पाठ पढ़ने वाली सरकारों की आखें नहीं खुलती दिख रही बल्कि संसाधनों पर इस्लामवादियों का पहला हक़ होने का असंवैधानिक जाप निरंतर जारी है | इस्लाम कुंठित हो चला है और इस्लामवादी व्यथित , गत १४०० सालों में दुनिया को बर्बरता के अलावा और कुछ ना दे पाने की कसक अब बौखलाहट में बदल चुकी है आखिर बदले भी क्यूँ ना ? सम्पूर्ण विज्ञान जगत बिना इस्लाम के आगे बढ़ चला है , कला और संस्कृति से कोई वास्ता अब बचा नहीं , पर्यावरण की चिंता और पृथ्वी पर जीवन का कोई मोह नहीं बस एक ही रटा - रटाया जुमला दोहराया जा रहा है कि जगत अज्ञानी है सिर्फ ' कुरान सत्य ' ! ऐसा दर्शन आखिर कैसे सह - अस्तित्व को मान्यता दे सकता है , तो सीधा हिसाब यह है कि किसी प्रकार से इस आगे बढ़ चले विश्व को घसीट कर पुराने ढर्रे पर खींच कर वापस लाया जाए ताकि इस्लामी श्रेष्ठता साबित की जाये | अब ' जिहाद ' करने के लिए इससे बड़ा मानदंड बनाने की क्या आवश्यकता है ?
गति चाहे धीमी ही सही लेकिन अब बर्बरता विरोधी चेतनाएं भी सजग हो रही हैं लेकिन एक स्वयम्भू राष्ट्र के रूप में हमारा अपना नजरिया निहायत ही शुतुरमुर्गी ही है , ऐसे में अगर आज कश्मीर के अस्तित्व पर संकट के बादल हैं तो कोई विशेष आर्श्चय की बात तो नहीं , कल को यदि पाकिस्तान से बांग्लादेश को जोड़ने के लिए अगर एक इस्लामिक गलियारा बनाये जाने के पक्ष में भी दूत ( इस्लामी जेहादी ) अगर मार्क्सवादियों के समर्थन से भारत में मुहीम शुरू कर भी दें तब भी मत चौंकियेगा , आखिर धार्मिक समरसता की और भी कीमत चुकाई जानी बाकी ही है | आज लड़ाई हथियारों से कम और विचारों से ज्यादा लड़ी जा रही है | देश का मानस सदैव ही विचारशील रहा है , विचारों ने ही हमें विश्वगुरु बनाया है अब ऐसे में जबकि सत्य सनातन संस्कृति एक वैश्विक खतरे के सबसे वीभत्स रूप से जूझ रही है राष्ट्र व्यक्तिगत आहुतियाँ मांग रहा है , मातृभूमि सपूतों से आह्वान कर रही है कि बलिदान का वक्त आ चुका है अब आवश्यकता है कि हम तलवार की धार के साथ - साथ कलम को तेज कर लें |
|| " सत्यमेव जयते " ||







